‘अज्ञातवास’ (8.5/10 Pints)

महान साहित्यकार श्री लाल शुक्ल लिखित उपन्यास की लेखन शैली अनूठी और प्रभावकारी है।

यह उपन्यास समाज के खोखलेपन को इस खूबसूरती से परखता हुआ गुजरता है कि पाठक को अचंभित कर देता है। राजेश्वर का चित्र रजनीकांत की मनः स्थिति का दर्पण है तो समाज की अराजकता को उन्होंने प्रकृति के चित्रण के साथ प्रतीकात्मक दृष्टि से समझाया है।

एक ग्रामीण युवक का शहरी उच्च संभ्रांत जीवन को अपनाना और फिर ग्राम्य जीवन को निम्नतर आंकना, फिर एक आयु के बाद अपने अतीत को याद कर एक तकलीफ में ज़ीना। उसकी कठिनाई को भी प्राकृतिक वस्तुओं से प्रतीकात्मक बनाया है।

जैसे- ‘बाँस के घने झुरमुट किसी किले की ऊँची-नीची दीवार की तरह खङे हुए थे।’……… ‘चिराग जल रहा था, हिलते हुए बाँसों के झाङ कभी-कभी उस प्रकाश को ढक लेते थे…… फिर दिख जाता।’ इस उपन्यास में मानव प्रवृति को इस तरह विशलेषित किया है कि हर व्यक्ति के अपने सुख- दुख होते हैं, अपनी गलतियाँ होती हैं अपने पछतावें होते है, जिन्हें वह दूसरों के साथ नहीं बाँट सकता है।

यह मानवीय स्वभाव है कि वह अपने से कमज़ोर को प्रताङित करता है, उच्च वर्ग निम्न व दलित वर्ग को शोषित करता है, एक पुरुष एक स्त्री को प्रताङित करता है- एक पति अपनी पत्नी को अपनी स्वामित्व संपत्ति समझता है।

इन विषयों पर पहले भी लिखा गया है, आज भी लिखा जाता है पर जिस भाषा शैली में यह लिखा गया है उससे मन द्रवित होता है, और सोचने को विवश करता है कि क्या कोई अपराध पछतावे के बाद क्षम्य है। आप जानते हैं कि कुछ अपराध इतने गहन होते हैं कि वह पछतावे और क्षमा के बाद भी अपनी विकृतता को खत्म नहीं करते हैं। क्योंकि वह समाज को और मानवता को पतन की ओर ले जाते हैं।

यह उपन्यास उन सबको अवश्य पढ़ना चाहिए जो हिन्दी भाषा को समझना चाहते है। साहित्य ही समाज का दर्पण है।

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